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60 दिन पहले कलेक्टर को देना होगा धर्मांतरण के लिए आवेदन

राज्य सरकार ने बनाए धर्मांतरण संबंधी नियम, अब मप्र में भय, लालच, डर से धर्मांतरण पर जाना होगा 10 साल के लिए जेल

भोपाल। अब मध्यप्रदेश में धर्मांतरण करना दुष्कर होगा, क्योंकि अब स्वेच्छा से धर्मपरितर्वतन करने वाले व्यक्ति और धर्मांतरण करवाने वाले धर्माचार्य को कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को आवेदन करना होगा। वहीं जिला कलेक्टर हर माह की 10 तारीख को राज्य सरकार को इस बारे में सूचना देंगे कि कितने आवेदन धर्मांतरण के आए और उन पर क्या हुआ। 

इस बारे में मध्यप्रदेश सरकार ने शुक्रवार को मप्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के प्रावधान निर्धारित कर दिए हैं। अधिनियम को लेकर राज्य सरकार ने नियम जारी कर (एमपी गवर्नमेंट रूल्स फॉर कनवर्जन) दिए हैं। इसमें प्रावधान किया गया है कि डरा-धमकाकर, प्रलोभन देकर यदि किसी ने धर्मांतरण कराया तो उसके खिलाफ 10 साल की सजा और 1 लाख तक का जुमार्ना लगाया जाएगा।

यह हैं प्रावधान

धर्मांतरण के लिए 60 दिन पहले धर्मांतरण करने वाले और धर्मांतरण करवाने वाले को आवेदन जिला कलेक्टर/मजिस्ट्रेट को देना होगा। इसमें बिना किसी दबाव, भय, लोभ, कपट आदि के धर्मांतरण की बात होगी। 

धर्मांतरण का आवेदन प्रत्यक्ष में उपस्थित होकर या डाक से भेजा जा सकेगा।  इसकी पावती कलेक्टर कार्यालय से मिलेगी। हालांकि बाद में पुष्टि के लिए जिला मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना होगा। जिला मजिस्ट्रेट समस्त तथ्यों को परखेगा और संतुष्ट होने पर धर्मांतरण की अनुमति प्रदान करेगा। 

जिलो में जितने भी धर्मांतरण के आवेदन आए और धर्मांतरण हुए, इसकी जानकारी प्रत्येक माह की 10 तारीख तक राज्य सरकार को जिला कलेक्टर देंगे। इसमें किसने और कितनों ने धर्मांतरण किया, कौन धर्माचार्य था, कहां आयोजन हुआ आदि की जानकारी रहेगी। 

2021 में पारित हो चुका है विधेयक

धर्मांतरण रोकने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2021 में राज्य सरकार ला चुकी है। इसको विधानसभा में पारित करने के बाद कानून भी बनाया जा चुका है। इसके नियम जारी नही हो सके थे, जिसके बारे में अब अधिसूचना जारी हुई है। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा-धर्मांतरण अधिकार नहीं

एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट जस्टिस एमआर  शाह और हिमा कोहली की बेंच ने धर्मांतरण को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए सख्त कानून बनाने के बारे में केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है। केंद्र ने 1977 में 'रेव. स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश सरकार' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच के फैसले का हवाला दिया है।  इस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अपने धर्म का प्रचार करना एक मौलिक अधिकार है, लेकिन किसी का धर्म बदल देना अधिकार नहीं है।

केंद्र ने बताया राज्यों का विषय

याचिकाकर्ता ने आईपीसी के तहत धर्मांतरण को दंडित करने का कानून बनाने की मांग की है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए केंद्रीय गृह मंत्रालय के हलफनामे में बताया गया है कि कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है। अभी तक 9 राज्यों- ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और हरियाणा ने लालच, धोखे या दबाव से होने वाले धर्म परिवर्तन के विरुद्ध कानून बनाया है।

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